Tuesday, June 15, 2010

कहां गई हंसी?

पहले हंसी दिखाई देती थी, फिर हंसी सुनाई पड़ने लगी...तब हंसी बाजार में खिलखिलाकर भाग रही थी और लोग उसके पीछे भाग रहे थे...लेकिन ये भागमभाग भी अब थम चुकी है...रिकार्ड घिस गए हैं...खजाना खाली है...और अब टीवी की हंसी हंसी बाजार के उसी नुक्कड़ पर खड़ी है, जहां दाग अच्छे लगते हैं, बीमार होने का मजा ही कुछ और है और जहां सब कुछ ठंडा-ठंडा कूल कूल है।


इंसान पहली बार कब हंसा होगा? हंसी खुद पर आई होगी या दूसरों पर, यह सदियों से बहस का विषय है। लेकिन कुछ महीने पहले तक चैनलों में हंसी को लेकर जो घमासान और हाहाकार मचा था, उसका नतीजा अब सामने है..। हंसी अब सहमी हुई सी इस कदर खड़ी है मानो डाइटिंग के दौर से गुजर रही हो।
पहले टीवी ऑन करते ही पता चल जाता था कि हंसी का दौर जारी है। हर चैनल के पास थी हंसी की खुराक। कहीं हंसी के शहंशाह तो कहीं बादशाह। कहीं हंसी के अवतार तो कहीं भगवान। कोई हंसा कर एहसान कर रहा है तो कोई कह रहा है राज मैं ही करूंगा।
हंसी के गोलगप्पे, हंसी के छींटे, हंसी की बौछार,हंसी की फुलझड़ी, हंसी की फुहार, हंसी की मार,हंसी की दहाड़, हंसी के आर-पार,होश उड़ा देने वाली हंसी, सन्न कर देने वाली हंसी, रूलाने वाली हंसी। बताइये, अब क्या चाहिए? इतनी हंसी और इतने प्रकार की हंसी कभी किसी ने देखी थी।
हर किसी की जिंदगी से जुड़ चुके थे-राजू श्रीवास्तव, भगवंत मान, सुनील पाल, एहसान कुरैशी,प्रताप फौजदार और भी कई बेनाम -अनाम सुरमा...लेकिन ये जोड़ फेविकोल का जोड़ साबित नहीं हुआ....। सबको लग रहा था कि शातिर कातिलों, साजिश रचने वाली सासों, नकाब ओढ़नेवाले गुनाहगारों,अपहरण की आंटियों, जिस्मफरोशी के टोकनों और बेतूकी हरकतें करने वाले बाबाओं को छोड़कर खबरिया चैनल अचानक हंसने-हंसाने पर क्यों उतारू हो गए ? तो इसका सीधा सा जवाब यही है कि आज हंसी बाजार के उसी नुक्कड़ पर खड़ी थी, जहां दाग अच्छे लगते हैं, बीमार होने का मजा ही कुछ और है और जहां सब कुछ ठंडा-ठंडा कूल कूल है।
पहले हंसी दिखाई देती थी, फिर हंसी सुनाई पड़ने लगी...तब हंसी बाजार में खिलखिलाकर भाग रही थी और लोग उसके पीछे भाग रहे थे ।
टीवी पर इसके पहले भी हंसी के कैर्यक्रम थे, लेकिन लाफ्टर चैलेंज के विजेताओं के साथ-साथ घायल पराजितों की एक ऐसी जमात खड़ी हो गई है...जो आपको बेवजह हंसाना चाहती है। हंसाते तो चाचा चौधरी भी थे। मुल्ला नसीरूद्दीन ने भी हंसाया है लोगों को, लेकिन वो जमाना कोई और था। तब शायद किसी को अपनी हंसी और हंसाने की कला पर इतना गुमान नहीं था कि कह सके-हंसोगे तो फंसोगे। तब इतनी हंसी की ऐसी की तैसी भी नहीं हुई थी।
लोग हंसते रहे हैं। लोग हंसते रहेंगे। लेकिन हंसी कभी इतनी नहीं बिकी, जितनी कि कुछ साल पहले तक बिकी..।
टीवी के इतिहास में शायद हंसी पहली बार टीआरपी के उस दौड़ में शामिल हो गई है,जिस दौड़ में कातिल की चाल, जिन्नात की पुकार, भूत की पसंद और पुजारी का पाखंड, सब बड़ी तेजी से भाग रहे थे...और सबसे ज्यादा तेज हंसी ने भागना शुरु किया। लेकिन इस भागमभाग के बाद हालात ये हो गए कति सन्नाटे को चीरती सनसनी नहीं, सन्नाटे को चीरती हंसी ने सबको सन्न कर दिया..।
देव प्रकाश चौधरी

7 comments:

  1. ... हंसी को लेकर आपकी उदासी विचारणीय है...।

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  2. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  3. सार्थक पोस्ट, साधुवाद

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  4. इंसान हंसना सीखेगा भाई.... कभी ना कभी तो सीखेगा...

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  5. आज दिनांक 25 सितम्‍बर 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में आपकी यह पोस्‍ट कहां गई हंसी शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्‍कैनबिम्‍ब देखने के लिए जनसत्‍ता पर क्लिक कर सकते हैं। कोई कठिनाई आने पर मुझसे संपर्क कर लें।

    बारिशरानी से रोमांटिक बातचीत


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  6. वाकई में हंसी बहुत खास है,आपके इस लेख को पढ़कर एहसास हुआ.............

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